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Saturday, June 16, 2018

Personality | Theories of personality | व्यक्तित्व का अर्थ / परिभाषा | व्यक्तित्व के उपागम

Vyaktitva ki paribhasha | Personality | Theories of personality

व्यक्तित्व का अर्थ / परिभाषा | व्यक्तित्व के उपागम

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vyaktitva ke siddhant


हर इंसान का व्यक्तित्व अलग होता है। इसे अंग्रेजी में पर्सनेलेटी  (Personality) कहते हैं, जो कि पर्सोना (Persona) से बना है। यह लेटिन भाषा का शब्द है। पर्साेना का अर्थ होता है मुखौटा। व्यक्तित्व निर्माण में अनेक तत्व सहायक होते हैं। आइये हम व्यक्तित्व को क्रम से समझते हैं। सबसे पहले हम जानेंगे व्यक्तित्व क्या है और इसकी परिभाषाएं। इसके बाद व्यक्तित्व के सिद्धान्त और वह सब जो की प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

ऑलपोर्ट (1937) के अनुसार :-
"व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोशारीरिक तन्त्रों का गतिशील या गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण में उसके अपूर्व समायोजन को निर्धारित करते हैं।" ऑलपोर्ट की इस परिभाषा में व्यक्तित्व के भीतरी गुणों तथा बाहरी गुणों को यानी व्यवहार को सम्मिलित किया गया है। परन्तु ऑलपोर्ट ने भीतरी गुणों पर अधिक बल दिया है।
व्यक्तित्व को निम्नलिखित रूप में विश्लेषित किया जा सकता है :-
मनोशारीरिक तन्त्र :-
व्यक्तित्व एक ऐसा तन्त्र है जिसके मानसिक तथा शारीरिक दोनों ही पक्ष होते हैं। यह तन्त्र ऐसे तत्वों का एक गठन होता है जो आपस में अन्त:क्रिया करते हैं। इस तन्त्र के मुख्य तत्व शीलगुण, संवेग, आदत, ज्ञानशक्ति, चित्तप्रकृति, चरित्र, अभिप्रेरक आदि हैं जो सभी मानसिक गुण हैं। परन्तु इन सब का आधार शारीरिक अर्थात व्यक्ति के ग्रन्थीय प्रक्रियाएं एवं तंत्रिकीय प्रक्रियाएं हैं।
गत्यात्मक संगठन
गत्यात्मक संगठन से तात्पर्य यह होता है कि मनोशारीरिक तन्त्र के भिन्न-भिन्न तत्व जैसे शीलगुण, आदत आदि एक-दूसरे से इस तरह संबंधित होकर संगठित हैं कि उन्हें एक-दूसरे से पूर्णत: अलग नहीं किया जा सकता। इस संगठन में परिवर्तन सम्भव है।
बाल मनोविज्ञान और शिक्षा शास्त्र
संगतता
व्यक्तित्व में व्यक्ति का व्यवहार एक समय से दूसरे समय में संगत होता है। संगतता का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति का व्यवहार दो भिन्न अवसरों पर भी लगभग एक समान होता है। व्यक्ति के व्यवहार में इसी संगतता के आधार पर उसमें संबंधित शीलगुण होने का अनुमान लगाया जाता है।
वातावरण में अपूर्व समायोजन का निर्धारण
प्रत्येक व्यक्ति में मनोशारीरिक गुणों का एक ऐसा गत्यात्मक संगठन पाया जाता है कि उसका व्यवहार वातावरण में अपने-अपने ढंग का अपूर्व होता है। वातावरण समान होने पर भी प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार, विचार, होने वाला संवेग आदि अपूर्व होते हैं। जिसके कारण उस वातावरण के साथ समायोजन करने का ढंग भी प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होता है।
इसलिए हम कह सकते हैं कि व्यक्तित्व में भिन्न-भिन्न शीलगुणों का एक ऐसा गत्यात्मक संगठन होता है जिसके कारण व्यक्ति का व्यवहार तथा विचार किसी भी वातावरण में अपने ढंग का अर्थात् अपूर्व होता है।

व्यक्तित्व के उपागम

व्यक्तित्व के स्वरूप की व्याख्या के लिए अनेक उपागम बताए गए हैं। इसी के तहत अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन भी विभिन्न विद्वानों ने किया है। जैसे:-

प्रकार उपागम या सिद्धान्त :-
प्रकार सिद्धान्त या उपागम व्यक्तित्व का सबसे पुराना सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति को विभिन्न प्रकारों में बांटा जाता है और उसके आधार पर उसके शीलगुणों का वर्णन किया जाता है।

मार्गन, किंग, विस्ज तथा स्कोपलर के अनुसार व्यक्तित्व के प्रकार से तात्पर्य, "व्यक्तियों के एक ऐसे वर्ग से होता है जिनके गुण एक-दूसरे से मिलते जुलते हैं।
जैसे :- अन्तर्मुखी व्यक्तित्व। ये लोग संकोचशील, एकांतवास, कम बोलना, हाजिर जवाब न होना आदि गुण पाए जाते हैं।
पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत
शारीरिक गुणों के आधार पर -
युनानी विद्वान हिप्पोक्रेटस ने शरीर द्रवों के आधार पर - व्यक्तित्व के चार प्रकार बताएं है। यू मूल रूप से चिकित्साशास्त्री थे। इनके अनुसार शरीर में चार मुख्य द्रव पाये जाते हैं
- पीला पित्त, काला पित्त, रक्त तथा कफ या श्लेष्मा। 
प्रत्येक व्यक्ति मे इन चारों द्रवो में से कोई एक द्रव अधिक प्रधान होता है और व्यक्ति का स्वभाव या चिन्तप्रकृति इसी की प्रधानता से निर्धारित होता है। इन्होंने अपनी पुस्तक नेचर ऑफ मैन (Nature of man) में इसका जिक्र भी किया है। इनके अनुसार :-
1 आशावादी
2 क्रोधी
3 मंद 
4 उदासीन ये चार प्रकार के व्यक्तित्व होते हैं।

क्रेश्मर का वर्गीकरण - 
क्रेश्मर एक जर्मन मनोवैज्ञानिक थे। जिन्होंने 1925 में एक बुक लिखी जिसका नाम साइकी एंड करेक्टर ( Physique and character ) था। इनके अनुसार व्यक्तित्व के चार प्रकार बताए गए हैं, जो कि निम्नवत् है: -
1 स्थूलकाय - ऐसे व्यक्ति का कद छोटा होता है तथा शरीर भारी एवं गोलाकार होता है, गर्दन छोटी और मोटी होती है। इनका स्वभाव सामाजिक और खुशमिजाज होता है।
2 कृशकाय - इस तरह के व्यक्ति का कद लम्बा होता है परन्तु वे दुबले पतले शरीर के होते है। ऐसे व्यक्तियों के शरीर की माँसपेशियाँ विकसित नही होती है। स्वभाव चिड़चिड़ा होता है तथा सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर रहने की प्रवृति अधिक होती है
3 पुष्टकाय - ऐसे व्यक्ति की माँसपेिशयाँ काफी विकसित एवं गठी होती है। शारीरिक कद न तो अधिक लम्बा होता है न अधिक मोटा। शरीर सुडौल और सन्तुलित होता है। इनके स्वभाव में न अधिक चंचलता होती है और न अक्तिाक मन्दन इन्हें काफी सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है।
4 मिश्रितकाय - इसमें उपरोक्त तीनों प्रकार के गुण मिलेजुले रूप में पाये जाते हैं।

शेल्डन का वर्गीकरण: -
शेल्डन ने 1990 में शारीरिक गठन के आधार पर सिद्धान्त दिया, जिसे सोर्मेटोटाइप सिद्धान्त कहा गया। शेल्डन ने व्यक्तित्व के तीन प्रकार बताए हैं :-
1 एण्डोमार्फिक या गोलाकार- इस प्रकार के व्यक्ति मोटे एवं नाटे दिखतेे हैं। आरामपसंद, खुशमिजाज, सामाजिक तथा खाने-पीने के शौकीन होते हैं। हर किसी का मनोरंजन कर सकते हैं।
2 मेसोमार्फिक या आयताकार - ऐसे लोगों की हडिड्याँ व माँसपेिशयॉ काफी विकसित होती हैं तथा शारीरिक गठन काफी सुडौल होता है।
3 एक्टोमार्फिक या लम्बाकार - ऐसे व्यक्तियों का कद लम्बा तथा दुबले पतले होते हैं। माँसपेशियाँ अविकसित तथा शारीरिक गठन इकहरा होता है। इन्हें अकेले रहना और लोगों से कम मिलना जुलना पसन्द है।
मनोवैज्ञानिक गुणो के आधार पर-
युंग (1923) ने व्यक्तित्व के दो प्रकार बताए हैं :-
1 बर्हिमुखी - इस तरह के व्यक्ति की अभिरूचि विशेषकर समाज के कार्यों की ओर होती है। वह अन्य लोगों से मिलना जुलना पसन्द करता है तथा प्राय: खुशमिजाज होता है।
2 अन्तर्मुखी - ऐसे व्यक्ति में बहिमुर्खी के विपरीत गुण पाये जाते हैं। इस तरह के व्यक्ति बहुत लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते है और उनकी दोस्ती कुछ ही लोगों तक सीमित होती है। इसमें आत्मकेन्द्रिता का गुण अधिक पाया जाता है।
आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अधिकतर मनुष्यों में दोनों श्रेणियों के गुण पाये जाते हैं अर्थात एक परिस्थिति में वे बहिर्मुखी व्यवहार करते हैं और अन्य में अन्तर्मुखी। ऐसे व्यक्तियों को उभयमुखी कहा जाता है।
अधिगम का अर्थ और परिभाषा
(2) शीलगुण उपागम -
शीलगुण सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति की संरचना भिन्न-भिन्न प्रकार के शीलगुण से ठीक वैसी बनी होती है जैसे एक मकान की संरचना छोटी - छोटी ईंट से बनी होती है। शीलगुण का समान्य अर्थ होता है व्यक्ति के व्यवहारों का वर्णन। जैसे- सतर्क, सक्रिय और मंदित आदि। शीलगुण सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार भिन्न-भिन्न शीलगुणों द्वारा नियन्त्रित होता है जो प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद रहते हैड्ड। शीलगुण सिद्धान्त में निम्नलिखित मनोवैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान है-
(1) आलपोर्ट का योगदान - 
ऑलपोर्ट का नाम शीलगुण सिद्धान्त के साथ मुख्य रूप से जुड़ा है। यही कारण है कि ऑलपोर्ट द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के सिद्धान्त को ‘ऑलपोर्ट का शीलगुण सिद्धान्त’ कहा जाता है। इन्होंने शीलगुणों को दो भागो में बांटा है -
1 सामान्य शीलगुण - सामान्य शीलगुण से तात्पर्य उन शीलगुणों से होता है जो किसी समाज संस्कृति के अधिकतर लोगों में पाया जाता है। 
2 व्यक्तिगत शीलगुण - यह अधिक विवरणात्मक होते हैं तथा इससे संभ्रान्ति भी कम होती है। ऑलपोर्ट के अनुसार व्यक्तिगत प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है-
1 कार्डिनल प्रवृत्ति या मुख्य विशेषक - इस तरह की व्यक्तिगत प्रवृत्ति व्यक्तित्व का प्रमुख एवं प्रबल गुण होता है कि उसे छिपाया नहीं जा सकता और व्यक्ति के प्रत्येक व्यवहार की व्याख्या इस तरह से कार्डिनल प्रवृत्ति के रूप में आसानी से की जा सकती है।
2 केन्द्रीय प्रवृत्ति- यह सभी व्यक्तियो में पायी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति में 5 से 10 ऐसी प्रवृत्तियां होती हैं जिसके भीतर उसका व्यक्तित्व अधिक सक्रिय रहता है। इन गुणों को केन्द्रीय प्रवृत्ति कहते हैं जैसे सामाजिकता, आत्मविश्वास आदि।
3 गौण प्रवृत्ति - गौण प्रवृत्ति उन गुणों को कहते हैं जो व्यक्तित्व के लिए कम महत्वपूर्ण, कम संगत, कम अर्थपूर्ण तथा कम स्पष्ट होते हैं। जैसे - खाने की आदत, केश शैली आदि। एक व्यक्ति के लिए कोई प्रवृत्ति केन्द्रीय प्रवृत्ति हो सकती है वहीं दूसरे के लिए गौण प्रवृत्ति हो सकती है।
(2) कैटल का योगदान - 
शीलगुण सिद्धान्त में ऑलपोर्ट के बाद आर.बी. कैटल का नाम महत्वपूर्ण माना गया है। कैटल ने प्रमुख शीलगुणों की शुरूआत ऑलपोर्ट द्वारा बतलाये गए 18,000 शीलगुणों में से 4,500 शीलगुणों को चुनकार किया। बाद में, इनमें से समानार्थ शब्दों को एक साथ मिलाकर इसकी संख्या उन्होंने 200 कर दी और फिर बाद में विशेष सांख्यीकी विधि यानी कारक विश्लेषण के सहारे अन्तर सहसंबंध द्वारा उसकी संख्या 35 कर दी। कैटल ने शीलगुणों को दो भागों में विभाजित किया है।
1 सतही शीलगुण - इस तरह का शीलगुण व्यक्तित्व के ऊपरी सतह या परिधि पर होता है। यानी ये शीलगुण ऐसे होते हैं जो व्यक्ति के दिन-प्रतिदिन की अन्त:क्रिया में आसानी से अभिव्यक्त हो जाते हैं।
2 स्रोत या मूल शीलगुण - कैटल के अनुसार मूल शीलगुण व्यक्तित्व की अधिक महत्पूर्ण संरचना है तथा इसकी संख्या सतही शीलगुण की अपेक्षा कम होती है। मूल शीलगुण सतही शीलगुण के समान, व्यक्ति के दिन प्रतिदिन की अन्त:क्रिया में स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं हो पाते।
मनोविष्लेषण सिद्धान्त -
सिगमण्ड फ्रायड (1856 - 1939) ने करीब - करीब 40 साल के अपने नैदानिक अनुभवों के बाद व्यक्तित्व के जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है, उसे व्यक्तित्व का मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त कहा जाता है। इन्होंने ये सिद्धान्त 1927 में दिया। मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त मानव प्रकृति या स्वभाव के बारे में कुछ मूल पूर्व कल्पनाओं पर आधारित है। इनमे से निम्नांकित प्रमुख हैं -

मानव व्यवहार ब्राह्य कारकों द्वारा निर्धारित होता है तथा ऐसे व्यवहार अविवेकपूर्ण, अपरिवर्तनशील, समस्थितिक हैं।
मानव प्रकृति पूर्णता, शरीरगठनी तथा अप्रलक्षता जैसी पूर्व कल्पनाओं से हल्के - फुल्के ढंग से प्रभावित होती है।
मानव प्रकृति आत्मनिष्ठ की पूर्वकल्पना से बहुत कम प्रभावित होती है। इन पूर्व कल्पनाओं पर आधारित मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त की व्याख्या निम्नलिखित तीन मुख्य भागों मे बांट कर की जाती है-
1 व्यक्तित्व की संरचना
2 व्यक्तित्व की गतिकी
3 व्यक्तित्व की विकास
1 व्यक्तित्व की संरचना - फ्रायड ने व्यक्तित्व की संरचना का वणर्न करने के लिए निम्नलिखित दो मॉडलों का निर्माण किया है -
(A) आकारात्मक मॉडल 
(B) गत्यात्यक मॉडल या संरचनात्मक मॉडल
A आकारत्मक मॉडल- मन का आकारात्मक मॉडल से तात्पर्य उन पहलुओं से होता है जहां संघर्षमय परिस्थिति की गत्यात्मकता उत्पन्न होती है। मन का यह पहलू सचमुच में व्यक्तित्व के गत्यात्मक शक्तियों के बीच होने वाले संघर्षो का एक कार्यस्थल होता है। फ्रायड ने इसे तीन स्तरों में बॉटा है- 
चेतन, अर्द्धचेतन तथा अचेतन
चेतन - चेतन से तात्पर्य मन के वैसे भाग से होता है जिसमें वे सभी अनूभूतियां एवं सेवेदनाएं होती है जिनका संबंध वर्तमान से होता है। 
अर्द्धचेतन - इसमें वे इच्छाएं, विचार, भाव आदि होते हैं जो हमारे वर्तमान चेतन या अनुभव में नहीं होते, लेकिन प्रयास करने पर वे हमारे चेतन मन में आ जाते हैं।
अचेतन - हमारे कुछ अनुभव इस प्रकार के होते हैं जो न तो हमारे चेतन में होते हैं और न ही अद्र्धचेतन में । ऐसे अनुभव अचेतन में होते हंै। फ्रायड के अनुसार पर अचेतन अनुभूतियों एवं विचारों का प्रभाव हमारे व्यवहार पर चेतन एवं अद्र्धचेतन की अनुभूतियों एवं विचारों से अधिक होता है।
B गत्यात्मक या संरचनात्मक मॉडल - फ्रायड के अनुसार मन के गत्यात्मक मॉडल से तात्पर्य उन साधनों से होता है जिनके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न मानसिक संघर्षों का समाधान होता है। ऐसे साधन या प्रतिनिधि तीन हैं -इदं या उपाहं (ID), अहं (Ego), तथा परम अहं (Super Ego),
इदम् या उपाहं  (ID) - यह व्यक्तित्व का जैविक तत्व है जिनमें उन प्रवृत्तियों की भरमार होती है जो जन्मजात होती हैं तथा जो असंगठित, कामुक, आक्रमकतापूर्ण तथा नियम आदि को मानने वाली नहीं होती है। ये पाश्विक भी हो सकती हैं। इदं प्रवृत्तियाँ "आनन्द सिद्धान्त" द्वारा निर्धारित होती हैं। यानि अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। 
अहं (Ego)- मन के गत्यात्मक पहलू का दूसरा प्रमुख भाग अहं है। अहं मन का वह हिस्सा है जिसका संबंध वास्तविकता से होता है। यह इदं पर नियंत्रण करता है। 
परम अहं (Super Ego) - परम अहं पूरी तरह नैतिकता और  आदर्शों पर आधारित है। जैसे -जैसे बच्चा बड़ा होता है वह अपना तादात्म्य माता - पिता के साथ स्थापित करता जाता है। जिसके परिणामस्वरूप वह यह सीख लेता है कि क्या अनुचित है तथा क्या उचित है। इस तरह के सीखने से परम अहम के विकास की शुरूआत होती है।
2 व्यक्तित्व की गतिकी - फ्रायड के अनुसार मानव जीव एक जटिल तन्त्र है जिसमें शारीरिक ऊर्जा तथा मानसिक उर्जा दोनों ही होते हैं। फ्रायड के अनुसार इन दोनों तरह की ऊर्जाओं का स्पर्श बिन्दु इदं या उपाहं होता है। फ्रायड व्यक्तित्व की गत्यात्मक पहलुओं जैसे - मूलप्रवृत्तियों, चिन्ता तथा मनोरचनाओं का वर्णन करता है।
मूल प्रवृत्ति - मूल प्रवृत्ति का तात्पर्य वे शारीरिक उत्तेजनाएं हैं जिनके द्वारा व्यक्ति के सभी तरह के व्यवहार निर्धारित किये जाते हैं। फ्रायड ने मूल प्रवृत्तियों को दो भागो में बाँटा - 
(A) जीवन मूल प्रवृत्ति
 (B) मृत्यु मूल प्रवृत्ति
अपने विशेष अहमियत के कारण फ्रायड ने जीवन मूल प्रवृत्ति से मौन मूलप्रवृत्ति को अलग करके वर्णन किया है। मौन मूल प्रवृत्ति के ऊर्जा बल को लिबिडो कहा गया है जिसकी अभिव्यक्ति सिर्फ लैगिक क्रियाओं के रूप में होती है। लिबिडो का अर्थ होता है काम शक्ति।
चिन्ता - चिन्ता एक ऐसी भावात्मक एवं दुखद अवस्था होती है जो अहं को आलम्बित खतरे से सतर्क करता है ताकि व्यक्ति वातावरण के साथ अनुकूलीत ढंग से व्यवहार कर सके। फ्रायड ने चिन्ता के तीन प्रकार बतलायें हैं।
अहं रक्षात्मक प्रक्रम - अहं रक्षात्मक प्रक्रम के विचार का प्रतिपादन सिगमण्ड फ्रायड ने किया परन्तु इसकी सूची उनकी पुत्री अन्ना फ्रायड तथा अन्य नव फ्रायडियन मनोवैज्ञानिकों ने तैयार की। यह प्रक्रम अहं को चिन्ताओं से बचा पाता है। रक्षात्मक प्रक्रमों का प्रयोग सभी व्यक्ति करते हैं परन्तु इसका प्रयोग अधिक करने पर व्यक्ति के व्यवहार में बाहयता एवं स्नायुविकृति का गुण विकसित होता है।
व्यक्तित्व का विकास - फ्रायड ने व्यक्तित्व विकास की व्याख्या दो दृष्टिकोण से की हैं। पहला दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है कि वयस्क व्यक्तित्व बाल्यवस्था के भिन्न-भिन्न तरह की अनुभूतियों द्वारा नियंत्रित होता है तथा दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार जन्म के समय लैंगिग ऊर्जा बच्चों में मौजूद होती है जो विभिन्न मनोलैगिंग अवस्थाओं से होकर विकसित होती है। फ्रायड के इस दूसरे दृष्टिकोण को मनोलैंगिक विकास का सिद्धान्त कहा जाता है। फ्रायड द्वारा प्रतिपादित मनोलैंगिक विकास के सिद्धान्त की पाँच अवस्थाएँ क्रम में निम्नांकित हैं -
1 मुखावस्था
2 गुदावस्था
3 लिंग प्रधानावस्था
4 अव्यक्तावस्था
5 जननेन्द्रियावस्था
कार्ल रोजर्स- व्यक्तित्व का सांवृत्तिक सिद्धान्त :-
कार्ल रोजर्स का सिद्धान्त घटना विज्ञान या सांवृत्तिकशास्त्र के नियमों पर आधारित है। 
सांवृत्तिकशास्त्र वह शास्त्र होता है जिसमें व्यक्ति की अनुभूतियों, भावों एवं मनोवृत्तियों तथा उनके अपने बारे में या आत्मन् के बारे में तथा दूसरों के बारे में व्यक्तिगत विचारों का अध्ययन विशेष रूप से किया जाता है। रोजर्स के सिद्धान्त को मानवतावादी आन्दोलन के अन्तर्गत एक पूर्णत: सांवृत्तिक सिद्धान्त माना गया है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धान्त को आत्म सिद्धान्त या व्यक्ति केन्द्रित सिद्धान्त भी कहलाता है। रोजर्स के व्यक्तित्व सिद्धान्त को निम्नांकित भागों में बांटा जा सकता है-
1 व्यक्तित्व के स्थायी पहलु
2 व्यक्तित्व की गतिकी
3 व्यक्तित्व का विकास
(1) व्यक्तित्व के स्थायी पहलु:- 
रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धान्त उनके द्वारा प्रतिपादित क्लायंट केन्द्रित मनोचिकित्सा से प्राप्त अनुभूतियों पर आधारित है। उनके सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में होने वाले परिवर्तनों एवं वर्धनों का अध्ययन करना है। इन्होंने व्यक्तित्व के दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर बल डाला है- प्राणी एवं आत्मन ।
A. प्राणी - रोजर्स के अनुसार पा्रणी एक ऐसा दैहिक जीव है जो शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक दोनों ही तरह से कार्य करता है। प्राणी सभी तरह की अनुभूतियों का केन्द्र होता है। इन अनुभूतियों में अपने दैहिक गतिविधियों से संबंधित अनुभूतियां तथा साथ ही साथ ब्राहय वातावरण की घटनाओं के प्रत्यक्षण की अनुभूतियां दोनों ही सम्मिलित होती हैं। सभी तरह की चेतन और अचेतन अनुभूतियों के योग से जिस क्षेत्र का निर्माण होता है, उसे प्रासंगिक क्षेत्र कहते हैं।
B. आत्मन - रोजर्स का व्यक्तित्व सिद्धान्त का यह सबसे महत्वपूर्ण संप्रत्यय है। धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर प्रासंगिक क्षेत्र का एक भाग अधिक विशिष्ट हो जाता है और इसे ही रोजर्स ने आत्मन कहा है। आत्मन व्यक्तित्व की अलग विमा नहीं होता है बल्कि आत्मन का अर्थ ही सम्पूर्ण प्राणी से होता है।
(2) व्यक्तित्व की गतिकी:- 
रोजर्स ने अपने व्यक्तित्व गतिकी की व्याख्या करने के लिए एक महत्वपूर्ण अभिप्रेरक का वर्णन किया है जिसे उन्होंने वस्तुवादी प्रवृत्ति (actualizing tendency) कहा है। रोजर्स के अनुसार वस्तुवादी प्रवृत्ति से तात्पर्य प्राणी में सभी तरह की क्षमताओं को विकसित करने की जन्मजात प्रवृत्ति से होता है जो व्यक्ति को अपने आत्मन को उन्नत बनाने तथा प्रोत्साहन देने का काम करता है।
(3) व्यक्तित्व का विकास:- 
रोजर्स ने फ्रायड एवं एरिक्सन की भांति व्यक्तित्व का कोई अवस्था सिद्धान्त प्रतिपादित नहीं किया है। उन्होंने व्यक्तित्व के विकास में आत्मन तथा व्यक्तित्व की अनुभूतियों में संगतता को महत्वपूर्ण बताया है। जब इन दोनों में अर्थात व्यक्ति की अनुभूतियों तथा उनके आत्म संप्रव्यय के बीच अन्तर हो जाता है तो इससे व्यक्ति में चिन्ता उत्पन्न होती है। असंगता के अन्तर से उत्पन्न इस चिन्ता की रोकथाम के लिए व्यक्ति कुछ बचाव प्रक्रियाएं प्रारम्भ कर देता है। इसे प्रतिरक्षा की संज्ञा दी गई है।
एब्राहम मैसलो का व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धान्त :-
एब्राहम मैसलो मानवतावादी मनोविज्ञान के आध्यात्मिक जनक माने गए हैं। मैसलो ने अपने व्यक्तित्व सिद्धान्त में प्राणी के अनूठेपन का उसके मूल्यों के महत्व पर तथा व्यक्तिगत वर्धन तथा आत्म निर्देश की क्षमता पर सर्वाधिक बल डाला है। इस बल के कारण ही उनका मानना है कि सम्पूर्ण प्राणी का विकास उसके भीतर से संगठित ढंग से होता है। इन आन्तरिक कारकों की तुलना में ब्राहय कारकों जैसे गत अनुभूतियों का महत्व नगण्य होता है।
व्यक्तित्व एवं अभिप्रेरण का पदानुक्रमिक मॉडल: - 
मैसलो के व्यक्तित्व सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण पहलु उसका अभिप्रेरण सिद्धान्त है। इनका विश्वास था कि अधिकांश मानव व्यवहार की व्याख्या कोई न कोई व्यक्तिगत लक्ष्य पर पहुंचने की प्रवृत्ति से निर्देशित होता है। मैसलो का मत था कि मानव अभिप्रेरक जन्मजात होते हैं और उन्हें प्राथमिकता या शक्ति के आरोही पदानुक्रम में सुव्यवस्थित किया जा सकता है। ऐसे अभिप्रेरकों को प्राथमिकता या शक्ति के आरोही क्रम में इस प्रकार बतलाया गया है-
इनमें से प्रथम दो आवश्यकताओं अर्थात शारीरिक या दैहिक आवश्यकता तथा सुरक्षा की आवश्यकता को निचले स्तर की आवश्यकता तथा अन्तिम तीन आवश्यकताओं अर्थात संबंद्धता एवं स्नेह की आवश्यकता, सम्मान की आवश्यकता तथा आत्म सिद्धि की आवश्यकता को उच्च स्तरीय आवश्यकता कहा है। इस पदानुक्रम मॉडल में जो आवश्यकता जितनी ही नीचे है, उसकी प्राथमिकता या शक्ति उतनी ही अधिक मानी गयी है।
यह क्रम इस प्रकार बनेगा :-
1 आत्मसिद्धि की आवश्यकता
2 सम्मान की आवश्यकता
3 संबद्धता और स्नेह की आवश्यकता
4 सुरक्षा की आवश्यकता 
5 शारीरिक या दैहिक आवश्यकता
व्यक्तित्व आंकलन
व्यक्तित्व आंकलन की प्रमुख तीन प्रविधियां होती हैं-
1 व्यक्तिगत प्रविधि
2 वस्तुनिष्ठ प्रविधि
3 प्रक्षेपण प्रविधि
(1) व्यक्तिगत प्रविधि :-
जब मूल्यांकनकर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएं मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं तो वे व्यक्तिगत विधि कहलाती हैं। इसके अन्तर्गत प्रमुखत: साक्षात्कार विधि, जीवन इतिहास विधि आत्मकथा व प्रश्नावली विधि आती है। 
2 साक्षात्कार विधि:-
साक्षात्कार विधि की सहायता से शोधकर्ता प्रयोजन के स्वयं के अनुभवों के बारे में अच्छी सूझ उत्पन्न कर सकता है और इस प्रकार व्यक्ति के उन सार्थक पक्षों के बारे में जान सकता है जिनके बारे में अन्य किसी संगठित व पूर्व निर्धारित परीक्षण द्वारा नहीं जाना जा सकता है।
3 जीवन इतिहास विधि:-
इस विधि में बालकों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिये एक केस विवरण या इतिहास तैयार किया जाता है। बालक द्वारा पिछले कई वर्षों में की गई अन्त:क्रियाओं का एक विशेष रिकार्ड तैयार किया जाता है। इन अन्त: क्रियाओं का विश्लेषण करके बालक के बारे में समस्त जानकारी प्राप्त की जाती है। इसमें बालक के बारे में समस्त सूचनायें संकलित की जाती हैं।
(2) वस्तुनिष्ठ प्रविधि :-
इसमें मूल्यांकनर्ता की व्यक्तिगत विशेषताएं मूल्यांकन की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करती। इसके अन्तर्गत आने वाली प्रमुख विधियां- निरीक्षण विधि, समाजमिति विधि, व्यक्तित्व प्रश्नावली मापनियां, कोटिक्रम मापनी आदि आते हैं।
व्यक्तित्व प्रश्नावली :-
कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यक्तित्व को मापने हेतु प्रमापीकृत प्रश्नावलियों का निर्माण किया गया है जिनकी सहायता से लोगों के शीलगुणों के बारे में जाना जा सकता है। 
उदाहरार्थ- 
16 व्यक्तित्व गुण (16 PF)  - यह प्रमुख मनोवैज्ञानिक कैटल द्वारा निर्मित है। इसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति के 16 शीलगुणों के बारे में बताया जा सकता है। इसका भारत में अनुकरण एस0डी0 श्रीवास्तव ने किया है जिसमें 187 कथन हैं। प्रत्येक कथन के समक्ष तीन विकल्प हमेशा, कभी-कभी व कभी नहीं है। इनमें से प्रत्येक कथन के लिए व्यक्ति को एक विकल्प चुनना होता है। इसके पश्चात स्टेन्सिल कुंजी की सहायता से व्यक्ति द्वारा चयनित उत्तरों को अंक प्रदान किए जाते हैं। सभी प्रतिक्रियाओं के लिए दिए गये अंकों को जोडक़र प्राप्तांक निकाला जाता है और इस प्रप्तांक के आधार पर स्टेन स्कोर ज्ञात किया जाता है। इस स्टेन स्कोर के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

समाजमिति- 
इस विधि द्वारा प्रत्येकव्यक्ति के आपसी स्वीकार व तिरस्कार की बारम्बारता द्वारा सामूहिक संरचना का अध्ययन किया जाता है। यह एक समूह के व्यक्तियों में आपसी सम्बन्धों का अध्ययन करती हैं। यह समूह में व्यक्ति की स्थिति व उसके स्तर को बताती है। इसके माध्यम से एक बड़े समूह में व्याप्त छोटे-छोटे समूहों की भी जानकारी मिलती है। इसके माध्यम से निम्न बातों को जाना जा सकता है।
मुख्यत: लिखित बातों की जानकारी दो तरह से प्राप्त की जा सकती है-
1 सोशियोंमीट्रिक मेट्रिशस
2 सोशियोंग्राम
(3) प्रक्षेपण प्रविधि :-
यह प्रक्षेपण के प्रत्यय पर आधारित है। फ्रायड के अनुसार प्रक्षेपण एक ऐसी अचेतन प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने अपूर्ण विचारों, मनोवृत्तियों, इच्छाओं, संवेगों तथा भावनाओं को दूसरे व्यक्तियों या वस्तुओं पर आरोपित करता है। इसके अन्तर्गत आने वाले प्रमुख परीक्षण इस प्रकार है:-
1 रोर्शा का इंक ब्लाट परीक्षण
2 थीमेटिक अपरशैप्सन परीक्षण
3 वाक्यपूर्ति परीक्षण
4 रोजनबिग पिक्चर फ्रस्टेशन परीक्षण
5 ड्रा ए मैन परीक्षण

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