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Friday, October 28, 2016

दूसरे के कंधे पर बंदूक कब तक...5


मैं साहब के साथ अप्रेल के महिने में अपने घर लौट आया। पहले साहब ने ज्वाइन किया फिर मैंने। चूंकी मुझसे पहले साहब यहां आए तो यह बातें उडऩे लगी थी कि मैं भी यहां आ रहा हूं क्या। साहब ने इस बात का खंडन किया। बात शांत नहीं हुई लेकिन अंदर सुलगती रही। एक दिन मैं यहां आ ही गया। यह बात अनेक लोगों को हजम नहीं होनी थी सो नहीं हुई। यह केवल बनाया हुआ माहौल था जिससे मैं अच्छी तरह वाकिफ था और हर तरह से चौकन्ना, सतर्क और तैयार भी। पहले से अधिक मजबूत भी। मजबूती का कारण यह था कि मैं कभी गलत नहीं रहा। काम में कभी कच्चा नहीं रहा। यह बात वो लोग भी जानते थे जो यह नहीं चाहते थे कि मैं कभी यहां आऊं। क्योंकि यहां अनेक दुकानें चल रही थी जो मरी नजर से नहीं बच सकती थी। मुझे टारगेट यही सौंपा गया कड़ी नजर रखूं और सटीक काम करूं। मुझे इसकी आदत है और मैं इसमें कभी फेल नहीं हुआ। मैंने एेसा ही किया और सटीक नजर के साथ सही सबूत एकत्र कर अनेक इलीगल दुकानें बंद करा दी। बदबूदार पंख फैलाए यहां अनेक लोगों को उनकी सीट तक सीमित कर दिया। काम काम जो समय पर नहीं था वह समय पर ला दिया। यह मेरी खूबी शुरू से  रही। प्रबंधन इस बात से कभी इनकार नहीं कर सकता। क्योंकि काम को समय पर लाने का तजुर्बा मैं शेखावाटी, मारवाड़ और दो बार पूर्व के इस शहर में कर चुका था। यह मेरा यहां दूसरा मौका था सो मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। जो दिक्कतें पेश करने की कोशिश की गई वो मैंने नजर अंदाज कर अपने काम को बखूबी अंजाम दिया और काम को कांटे से मिला दिया। प्रबंधन को फिर मानना पड़ा कि जो काम मुझे सौंपा जाएगा वह पूरा होना ही है। सो मैं इसी बात के कारण अधिक मजबूत था। मुझे मेरी काम और अनुभव की ताकत अच्छी तरह पता थी। यहां एक बात बड़ी अजीब घटित हो रही थी। वो मुझे भी हैरान कर रही थी। कारण मैं समझ रहा था लेकिन धूल छंट नहीं पा रही थी। यह धूल मुझे ही छांटनी थी। साहब भी अपने काम में तेजी से लगे थे। शिकंजा कस दिया था और काफी गड़बडि़यां यहां उन्होंने एकदम बंद कर दी। सांप सूघ गया पूरी ब्रांच को। साहब की यह खूबी थी कि वह इनसान को पहचानने में माहिर थे। मैंने यह कला उन्हीं से सीखी। इसी वजह से मैं उनकी फितरत भी पहचान सका। यही मेरे काम आया और मैं अपने आप को बचा सका। किसी का बुरा बने बिना। यहां मुझे लगा कि साबह के साथ गुजारे करीब दस वर्ष मेरे काम आ रहे हैं। इस शहर में मेरा चौकन्ना पन मेरे काम तो आया ही साबह के काम भी खूब आया, मेरी सूचनाओं को काम में भी  लिया गया लेकिन मेरे अनुसार नहीं। मुझे इसका मलाल नहीं था क्योंकि मैं समझ चुका था कि साहब कंधा तलाश रहे हैं। मैं नहीं चाहता था कि वह कंधा मेरा हो। मुझे अहसास हो गया कि यहां उन्नति का शिखर ध्वस्त होने को है। सूरज अस्तांचल को जाने वाला है। शायद इसके बाद उदय भी न हो। पूरा जोर लगाया जा रहा था लेकिन मैंने अपने सभी लोभ समाप्त कर दिए और अपना कंधा साफ बचा गया। नीतिगत मुझे अलग होना पड़ा। इसका नतीजे जोरदार निकले। यह मैं आपको आगे की किश्त में बताऊंगा। बस आप डटे रहें मेरे साथ...मेरे अनुभवों के साथ।
क्रमश:

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